मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान से जुड़े हालात ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। एनर्जी डेटा फर्म Kpler के आकलन के मुताबिक, भारत के पास करीब 100 मिलियन बैरल कच्चे तेल का उपलब्ध स्टॉक है। इस कुल भंडार में रिफाइनरियों और स्टोरेज टैंकों में रखा तेल, भूमिगत रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और समुद्र में भारत की ओर आ रहे टैंकरों में लदा कच्चा तेल शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आपूर्ति पूरी तरह रुक भी जाती है, तो मौजूदा भंडार देश की तेल जरूरतों को लगभग 40 से 45 दिनों तक संभाल सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर भारत की निर्भरता
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से मंगाता है। इनमें से आधे से ज्यादा—करीब 50 से 55 प्रतिशत—आपूर्ति मध्य पूर्व के देशों जैसे इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से होती है। इन देशों से आने वाला अधिकांश तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है।
ऊर्जा विश्लेषण से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, भारत रोजाना औसतन 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से आयात करता है, जो उसके कुल आयात का लगभग आधा है। वैश्विक स्तर पर भी यह मार्ग बेहद अहम है—दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले कच्चे तेल निर्यात का लगभग 20-21 प्रतिशत और एलएनजी शिपमेंट का करीब 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है।
भारत के लिए इसकी अहमियत सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। कतर से आने वाली एलएनजी सप्लाई भी बड़े पैमाने पर इसी मार्ग पर निर्भर करती है, जिससे देश की गैस आधारित ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं।
रणनीतिक भंडार की स्थिति
भारत ने आपात हालात से निपटने के लिए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) तीन प्रमुख स्थानों पर विकसित किए हैं—
विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)
मैंगलोर (कर्नाटक)
पाडुर (कर्नाटक)
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यदि रणनीतिक भंडार, रिफाइनरी स्टॉक और अन्य उपलब्ध भंडार को एक साथ जोड़ा जाए तो देश के पास करीब 74 दिनों की खपत के बराबर तेल उपलब्ध हो सकता है।
हालांकि, ऊर्जा विश्लेषण करने वाली कंपनियां अलग आकलन पेश करती हैं। उनके अनुसार, अगर खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति पूरी तरह बाधित होने की स्थिति पर विचार किया जाए और केवल वाणिज्यिक स्टॉक को आधार बनाया जाए, तो यह भंडार करीब 40 से 45 दिनों तक ही जरूरतें पूरी कर पाएगा।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इन रिजर्व का उद्देश्य अचानक आपूर्ति झटकों से निपटना है, न कि लंबे समय तक पूरी तरह आपूर्ति बंद रहने जैसी स्थिति को संभालना।
कीमतों पर तत्काल असर
ईरान से जुड़े ताज़ा तनाव के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज हलचल देखी गई है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क Brent Crude 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जो हाल के दिनों में करीब 10 प्रतिशत तक की बढ़त को दर्शाता है। कुछ कारोबारी सत्रों में यह 77 से 82 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में उतार-चढ़ाव करता रहा।
भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए इसका सीधा असर आयात बिल पर पड़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में देश ने कच्चे तेल के आयात पर लगभग 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। वहीं चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जनवरी के बीच 206.3 मिलियन टन तेल आयात पर करीब 100.4 अरब डॉलर पहले ही खर्च हो चुके हैं। यदि कीमतों में तेजी जारी रहती है तो आयात बिल बढ़ेगा, जिसका दबाव महंगाई और रुपये की स्थिति पर भी पड़ सकता है।