यूएस ट्रेड डील और RBI के कदम बेअसर, डॉलर के मुकाबले फिर टूटा रुपया

us trade deal and rbi steps fail to support rupee falls against dollar

Sneh Sharma
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Dollar vs Rupee: अमेरिका के साथ ट्रेड डील और यूरोपीय संघ तथा ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर सहमति बनने के बाद भी रुपये को खास सहारा नहीं मिल पा रहा है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया शुरुआती सत्र में एक पैसे की गिरावट के साथ 90.67 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। हालांकि कारोबार की शुरुआत में यह 90.63 प्रति डॉलर पर मजबूत खुला था, लेकिन जल्द ही बिकवाली के दबाव में फिसल गया। इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव के बाद 90.66 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।

क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?

जानकारों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की निकासी और अमेरिकी डॉलर की लगातार मजबूती रुपये पर दबाव बना रही है। छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 0.02 फीसदी बढ़कर 96.93 पर पहुंच गया, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर भी दिखाई दे रहा है।
इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में हल्की तेजी भी रुपये के लिए अनुकूल नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 67.78 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता देखा गया।

फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के अनिल कुमार भंसाली का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अवकाश की वजह से फिलहाल कैश डिमांड कम बनी हुई है, लेकिन बाजार की नजर 16 फरवरी को जारी होने वाले व्यापार संतुलन के आंकड़ों पर टिकी है। इस बीच घरेलू शेयर बाजार में भी कमजोरी देखने को मिली। बीएसई का सेंसेक्स करीब 82,555 के स्तर तक फिसल गया, जबकि निफ्टी 25,459 के आसपास आ गया। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने शुक्रवार को 7,395 करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयरों की बिकवाली की, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना।

विदेशी मुद्रा भंडार में कमी का असर

Reserve Bank of India द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, 6 फरवरी को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.711 अरब डॉलर घटकर 717.064 अरब डॉलर पर आ गया। भंडार में आई यह गिरावट भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर रही है। कुल मिलाकर मजबूत डॉलर, विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और घटता विदेशी मुद्रा भंडार—ये सभी कारक मिलकर रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं।

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