भारत और अमेरिका का व्यापार समझौता: भारत को मिला कूटनीतिक फायदा

Sneh Sharma
भारत को मिला कूटनीतिक फायदा

अमेरिका ने कुछ देशों पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगाया है। इनमें से ब्राजील पर 50 प्रतिशत, म्यांमार और लाओस पर 40 प्रतिशत, चीन पर 37 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका पर 30 प्रतिशत टैरिफ शामिल है। भारत के आसपास के देशों जैसे वियतनाम और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत, जबकि पाकिस्तान, मलेशिया, कंबोडिया और थाईलैंड पर 19 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है। ऐसे में देखा जाए तो भारत पर कम टैरिफ होने की वजह से भारतीय उत्पाद अमेरिका में इन देशों के सामान से सस्ते पड़ेंगे। जब दाम कम होंगे तो मांग बढ़ना स्वाभाविक है, और इसका सीधा फायदा भारत को मिलने वाला है।

कम टैक्स के बावजूद भारत की स्थिति सुरक्षित
अगर हम उन देशों कि बात करें जिन पर अमेरिका ने सबसे कम टैरिफ लगाया है, तो सूची में यूनाइटेड किंगडम (10 प्रतिशत), यूरोपीय संघ, स्विट्जरलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया (सभी पर 15 प्रतिशत) शामिल हैं। ये देश अमेरिका के पारंपरिक और करीबी साझेदार माने जाते हैं।
इसके बावजूद भारत के लिए यहां कोई बड़ी चुनौती नहीं बनती। वजह यह है कि भारत अमेरिका को जिन उत्पादों का निर्यात करता है, वे इन देशों के निर्यात से काफी अलग हैं। साथ ही इन देशों में श्रम लागत काफी ज्यादा है, जिससे उनके उत्पाद स्वाभाविक रूप से महंगे पड़ते हैं।

टकराव से समझौते तक भारत-अमेरिका संबंध
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर सहमति बनना वैश्विक स्तर पर एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दोनों देश रणनीतिक तौर पर एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं। व्यापार के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं रहे हैं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद ये मतभेद खुलकर टकराव में बदल गए।

भारत के निर्यात को मिलेगा बल
हाल ही में भारत ने यूरोप के साथ व्यापार समझौते का ऐलान किया है और इसके तुरंत बाद अमेरिका के साथ भी ट्रेड डील को अंतिम रूप दे दिया गया। इन दोनों समझौतों से साफ है कि आने वाले समय में अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में भारतीय निर्यात को बड़ा सहारा मिलेगा।साथ ही भारत, अमेरिका और यूरोप की यह साझेदारी उस चीन को वैश्विक स्तर पर संतुलित कर सकती है, जो अब तक कई अहम सप्लाई चेन की रीढ़ बना हुआ है। इन समझौतों से भारत को केवल बड़े बाजार ही नहीं मिलेंगे, बल्कि उन्नत तकनीक और विदेशी निवेश के नए रास्ते भी खुल सकते हैं।

 

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